संघ के 100 वर्ष: संगठन, सेवा और संस्कार की शताब्दी यात्रा, ‘पंच परिवर्तन’ से समर्थ भारत निर्माण का संकल्प |

हरिद्वार | विजयदशमी पर स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपने 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। एक छोटे से संगठन के रूप में प्रारंभ हुआ संघ आज विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन बन चुका है। शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ ने संगठन, सेवा, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण की अपनी यात्रा का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए “आओ बनाएँ समर्थ भारत” का आह्वान किया है । संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का मानना था कि राष्ट्र की स्वतंत्रता, समाज की एकता और भारत के परम वैभव का मार्ग संगठित समाज से होकर गुजरता है। इसी विचार के साथ उन्होंने दैनिक शाखा की कार्यपद्धति विकसित की, जिसके माध्यम से देशभक्ति, अनुशासन, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त कार्यकर्ताओं का निर्माण हुआ । आज संघ का कार्य देश के लगभग प्रत्येक जिले तक पहुंच चुका है। देशभर में 83 हजार से अधिक दैनिक शाखाएं और 32 हजार से अधिक साप्ताहिक मिलन संचालित हो रहे हैं। उत्तराखंड में भी 1624 दैनिक शाखाएं, 421 साप्ताहिक मिलन और 293 संघ मंडलियां सक्रिय हैं। माणा, मुनस्यारी, धारचूला, हर्षिल और आराकोट जैसे दूरस्थ क्षेत्रों तक संघ की नियमित गतिविधियां संचालित हो रही हैं । 1.29 लाख सेवा प्रकल्पों के माध्यम से समाज सेवा संघ के स्वयंसेवक स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कार और स्वावलंबन के क्षेत्रों में देशभर में 1.29 लाख से अधिक सेवा कार्य संचालित कर रहे हैं। उत्तराखंड में संस्कार शालाओं, छात्रावासों, चिकित्सा सेवाओं, आपदा राहत और तीमारदार विश्राम गृह जैसी अनेक योजनाएं समाज के सहयोग से संचालित की जा रही हैं । ‘पंच परिवर्तन’ बनेगा शताब्दी वर्ष का प्रमुख अभियान संघ ने आगामी वर्षों में समाज जागरण के लिए पांच प्रमुख विषयों—सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, स्व आधारित जीवन और नागरिक कर्तव्यबोध—पर विशेष अभियान चलाने का निर्णय लिया है। संघ का मानना है कि इन पांच क्षेत्रों में जनभागीदारी बढ़ाकर समाज में सकारात्मक और स्थायी परिवर्तन लाया जा सकता है।
“सभी के सहयोग से बनेगा समर्थ भारत” शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ ने समाज के सभी वर्गों से मतभेद भुलाकर राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में सहभागी बनने का आह्वान किया है। संघ का कहना है कि भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने और परम वैभव तक पहुंचाने के लिए सज्जन शक्ति का सक्रिय सहयोग और सामूहिक पुरुषार्थ आवश्यक है । आइए, संगठन, सेवा और संस्कार की इस शताब्दी यात्रा में सहभागी बनकर समर्थ, समरस और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का संकल्प लें ।

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